हिन्दी अनुवाद: डॉक्टर अमरजीत कौंके
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गुरजीत अपने स्कूल का सबसे शरारती लड़का था। वह किसी शरारत में कभी भी पीछे ना रहता। लगभग सभी अध्यापक हर एक पीरियड में उसे बुरा भला कहते। ऐसी हालत में वह आए दिन और ढीठ और जिद्दी बनता गया। उसके मन में यह बात बस गई के थोड़ी झिड़कें और मार से कुछ फर्क नहीं पड़ता।
पढ़ाई में उसने कभी मन नहीं लगाया। खेल भी खेलता लेकिन फाउल मारना उसका शौक बन गया था, इसलिए स्कूल के मास्टर उसे टीम में कम ही खेलने का अवसर देते थे। लेकिन वह खुद ही हाथ पैर मारने में बहुत तेज था। उसके स्कूल में अंग्रेजी के नए अध्यापक आए। उन्होंने पहले दिन ही सुबह की सभा में यह भाषण दिया,” प्यारे विद्यार्थियों जीवन बहुत अनमोल है समय कभी भी किसी को माफ नहीं करता। इसकी कदर करो। यह समय वापस नहीं लौटेगा। अगर मैं चाहूं कि मैं लौटकर तुम्हारी उम्र का बन जाऊं तो ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हारी इस समय एक ही जिम्मेदारी है और वह है पढ़ना लिखना और अच्छे इंसान बनना। इसलिए समय को संभालो। चिंता का त्याग करके पढ़ो जो विद्यार्थी रोज का काम रोज़ करता है वह कभी फेल नहीं होता। यह भी याद रखो कि इस संसार में असंभव कुछ भी नहीं है। जो चाहिए वह हम लगन और मेहनत से हासिल कर सकते हैं।”
नए सर की बातों में एक बात गुरजीत के दिल में बैठ गई कि हम जो चाहिए वह कर सकते हैं। वह अपने मित्र जस्सी को कहने लगा यार क्या यह सत्य है कि हम जो चाहे वह कर सकते हैं।”
“हां यार मुझे तो लगता है यह बात सत्य है।” गुरजीत गंभीर होकर कह रहा था
“अगर सत्य है तो मुझे उड़ कर दिखाओ।”
जस्सी ने उसे उसके आगे समस्या रख दी थी।उसके लिए यह सबक बहुत कठिन था। इतने में उनकी बातें सुन रहा गुरजिंदर बोल पड़ा,” सर के कहने का मतलब यह है कि हम पढ़ लिख कर ज्ञान हासिल करके सब कुछ कर सकते हैं। जिन्होंने जहाज बनाए हैं वह तो वह भी तो हमारे जैसे ही मनुष्य थे। क्या वह नहीं उड़ते। हम भी पढ़ लिख कर मेहनत करके जो चाहे कर सकते हैं।”
” आया बड़ा सर का हिमायती।वह भी बंदे थे जिन्होंने जहाज बनाया। जस्सी ने गुरजिंदर की बात पर व्यंग्य कसते हुए कहा।
“तुमने पढ़ा नहीं पहली बार उड़ान भरने का यत्न राइट भाइयों ने किया था। जहां से जहाज की खोज हुई। क्या वह मनुष्य नहीं थे। गुरजिंदर ने स्पष्ट करते हुए समझाया, ” हां भाई याद आया यह बात तो हमारे सर ने बताई थी। उन्होंने यह भी कहा था कि गुरुत्व आकर्षण की खोज करने वाला न्यूटन भी साधारण आदमी था और स्टीफसन ने रेल के इंजन की खोज की थी।” गुरजीत के दिमाग में सारी बात पड़ गई थी और वह अब अपने अध्यापक का इशारा भी समझ गया था।
अंग्रेजी वाले सर ने बहुत ही दिलचस्प तरीके से पढ़ा रहे थे लेकिन गुरजीत अपनी आदत से बाज न आया उसने शरारत कर ही दी। अध्यापक ने उसे खड़ा किया और बहुत प्यार से समझाया, ” देख बेटा तेरा तेरे माता-पिता तुम्हें कितनी कठिनाई से पढ़ा रहे हैं वह कितनी दूर साइकिल पर काम करने जाते हैं और फिर तेरे लिए किताबें, कॉपियां, कपड़े और खाने-पीने की वस्तुएं लेकर आते हैं। तो बेटे उनकी कमाई को बर्बाद ना कर। नहीं तो तू बहुत पछताएगा।”
अध्यापक ने बहुत प्यार से उसे बिठा दिया और पाठ आगे पढ़ने लग पड़े। गुरजीत को लगा वह सचमुच ही गलत है लेकिन उसका साथी इन बातों को समझ नहीं पा रहा और गुरजीत के मन पर अध्यापक की बातों का असर न होने दे रहा। अध्यापक ने गुरजीत को गुरजिंदर के साथ बैठने के लिए कहा। साथ ही हिदायत की कि गुरजिंदर उसकी आदतों का सुधार करे ना कि खुद उसकी बुरी आदतों में फंस जाए। जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है। इस तरह गुरजीत पर भी गुरजिंदर का रंग चढ़ने लगा और वह अंग्रेजी वाले सर का सारा काम पूरी लगन और मेहनत से करने लगा। धीरे-धीरे उसकी आदत बाकी विषयों में काम करने की भी बन गई। एक दिन स्कूल के मुख्य अध्यापक ने हिसाब की क्लास चेक की। जब भी वे कोई सवाल पूछते तो उसका हाथ सबसे पहले खड़ा होता और वह जवाब भी सही दे रहा था।
मुख्याध्यापक ने हैरान होते हुए पूछा,” बेटे तेरे में यह इतना परिवर्तन कैसे आ गया।”
” सर यह सब कुछ अंग्रेजी वाले सर की प्रेरणा के कारण हुआ जिन्होंने मुझे बढ़िया रिसाले और पुस्तकें पढ़ने के लिए दी और बहुत ही प्यार से जिंदगी का असली मार्ग दिखा दिया। बस अब तो मैं खेलों में भी अपने स्कूल का नाम रोशन करुंगा” गुरजीत ने बहुत फख्र से कहा।
स्कूल में वार्षिक खेल हुए तो गुरजीत जोन के बाद जिले में भी बड़ी प्राप्तियां कर गया। राज्य स्तर के एथलेटिक्स के मुकाबले में बेस्ट एथलीट बना तो पंजाब के राज्यपाल से ईनाम लेता हुआ बोला, ” सर यह सारी प्राप्ति मेरे इस अध्यापक की प्रेरणा की वजह से ही है। अगर यह हमारे स्कूल में ना आते तो अब तक मैं शायद किसी केस में जेल की हवा खा रहा होता। पंजाब के राज्यपाल ने बच्चे का विचार सुनते ही उसी समय स्कूल के लिए विशेष ग्रांट और अंग्रेजी वाले सर को विशेष पुरस्कार देने का ऐलान कर दिया।
