बाल कहानी : कहना ना मानने का फल

हिंदी अनुवाद : डॉ. अमरजीत कौंके (98142 31698) ********

जीनत की मम्मी और सारा परिवार बहुत ही धार्मिक विचारों वाले थे। वह हर धार्मिक समारोह में बहुत श्रद्धा और चाव से भाग लेते। इन सबका प्रभाव स्वाभाविक ही जीनत के मन पर भी पड़ा था। वह भी हर धार्मिक कार्य में आगे होकर हिस्सा लेती। जीनत जितनी पढ़ाई में होशियार थी, उस से ज़्यादा उसे एथलेटिक्स से प्यार था। वह महान दौड़ाकों की बातें सुनती और उनके पदचिन्हों पर चलने के सपने देखती। उन सपनों को पूरा करने के लिए रात-दिन मेहनत भी करती।एक दिन उसके दादा जी ने उसे पंजाब की सुनीता रानी और माधुरी ए सिंह की कहानी सुनाई, तो उसके भीतर और भी उत्साह पैदा हो गया। बाबा जी ने बताया, , “बेटी माधुरी का पहला नाम माधुरी सक्सेना था जो यू पी के एक साधारण पिता श्री बाबू लाल सक्सेना के घर में जन्मी। बहुत ही साधारण तरीके से वह दौड़ों की दुनिया में स्थान बनाने लगी। वह दिन-रात मेहनत करती हुई आगे से आगे बढ़ती गई । विश्व स्तर के अनेक एथलेटिक्स मुकाबलों में सोने, चाँदी और काँसे के पदक जीतकर एशियन खेलों में भी चाँदी का पदक जीतकर एशियन स्टार बन गई। इसी के साथ ही अर्जुन पुरस्कार भी प्राप्त कर गई। उसने महिलपुर जिला होशियारपुर प्रसिद्ध कोच एथलीट अमनदीप सिंह के साथ विवाह के बंधन में बँधकर बेटी हरमिलन तथा बेटे शानदीप को जन्म दिया। एशियन और ओलंपिक जैसी प्राप्तियां उसकी बेटी ने जन्म के बाद की हैं। उनकी बेटी हरमिलन ने भी अपनी माता की प्राप्तियों से प्रेरणा लेकर एशियन खेलों में सिल्वर मेडल जीतकर एशियन रिकॉर्ड कायम कर दिया।” “दादा जी! अमनदीप बारे भी बताइए?” बेटे, अमनदीप प्रसिद्ध लेखक और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पंजाबी अध्यापक ज्ञानी हरकेवल सिंह सैलानी का छोटा पुत्र है, जिसने माधुरी की तरह राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर सौ और आठ सौ मीटर दौड़ो में पदकों के साथ शानदार प्रदर्शन किया है। उसके माता जी सेवा-मुक्त सेंटर हेड टीचर बीबी गुरमीत कौर बैंस जो नगर कौंसल माहिलपुर के प्रधान और काउंसलर भी रहे। इस तरह बेटे बड़े खिलाड़ियों की प्रेरणाओं के कारण बच्चे भी खेल प्रतियोगिताओं में तुम्हारी तरह आगे बढ़ते हैं। वे किसी आसमान या किसी दुनिया से नहीं आते। आजकल जीनत राजकीय कॉलेज में राज्य स्तरीय एथलेटिक्स मीट की तैयारियों में जुटी हुई है। वह कुछ दिनों के लिए घर आई तो उसकी माता उसकी कामयाबी के लिए दुआएँ करने में लगी थी। उसने जीनत से भी यही कहा, “बेटे, इन फोटों के आगे माथा टेक कर आशीर्वाद लो यही तुम्हें कामयाबी दिलाएंगे।” “मम्मी जी, फ़िक्र मत करो। मैं तो आपको मिलने और कुछ दिन आराम करने आई हूँ। लेकिन आप मुझे किन कामों में फंसा रहे हो। हमारे कोच कहते हैं कि कामयाबी सिर्फ मेहनत और लगन से अभ्यास करने से ही मिलती है।” “बेटी, वे अपनी जगह सच्चे हैं लेकिन ये कठिनाई के वक्त में मनुष्य के सहाई होते हैं।” “यह जो कर्मों का चक्कर है यह क्या है? हर धार्मिक ग्रंथ यही कहता है कि कर्मों का फल हर इंसान को भोगना पड़ता है।” जीनत ने अपनी माँ को एक अहम सवाल पूछा। “तू छोड़ बेटी इन बातों को। हां तुम्हारे कैंप के दौरान व्रत आएंगे उनको मत भूलना। बेटियों को इसका बहुत फल मिलता है।” “अच्छा मम्मी जी,” यह कहकर जीनत सो गई। कैंप के दौरान कोच ने डाइट और आराम पर बहुत ज़ोर दिया ताकि अभ्यास के दौरान किसी तरह की रुकावट ना आए लेकिन जीनत बेचारी दो पुड़ों के बीच फंस गई थी उसके लिए मम्मी की हिदायत भी जरूरी थी जिसने बाद में फल देना था और दूसरी तरफ कोच की नसीहतें जिनका फल चयन होते ही राष्ट्रीय एथलीट बनने का, कुछ ही दिनों में मिल जाना था। जीनत ने कोच सर को बताए बगैर ही व्रत रखना आरंभ कर दिए। आखिर में जब चयन करता चयन करने के लिए बैठे तो कोच को पूरा यकीन था कि जीनत जो सारे कैंप के दौरान बहुत बढ़िया प्रदर्शन कर रही थी उसका चयन जरूर होगा। 800 मीटर का ट्रायल आरंभ हुआ तो जीनत10 मीटर के फासले पर सबसे आगे चल रही थी। लेकिन जब आखिरी राउंड में आखिरी 10 मिनट रह गए तो उसके शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया क्योंकि व्रत रखने के कारण उसके भीतर पहले जैसी शक्ति नहीं थी रही उससे तीन लड़कियां और आगे निकल गई और वह राष्ट्रीय एथलेटिक्स मुकाबले में जाने से रह गई। कोच ने हैरानी से पूछा, “जीनत! यह क्या हुआ?” जीनत का जवाब था, “कोच सर! मम्मी का कहना। जिसका फल पता नहीं कब मिले। लेकिन आपका कहना ना मानने का फल आज ही मिल गया।” यह कहकर वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी ।